कभी मेहरबाँ होकर पुकारो ,तो मैं आ जाऊं
कोई शाम साथ गुजारो , तो मैं आ जाऊं
आँखों में दिखती है चाहत तुम कहती हो प्यार नहीं
झूट का ये पर्दा उतारो ,तो मैं आ जाऊं
तारे नगमे चाँद और फूल तुमसा प्यारा कोई नही
छुप जाओ सारे नज़रों ,तो मैं आ जाऊं
जिन्दगी के सफ़र में हमसफ़र ही छलते हैं
तुम जो मेरा जीवन संवारों ,तो मैं आ जाऊं
कभी मेहरबाँ होकर पुकारो ,तो मैं आ जाऊं
कोई शाम साथ गुजारो , तो मैं आ जाऊं
13.NOV.2011
ܔܢܜܔRaJu bAuDhIi(๏̯͡๏ - 9:39 AM
di vikash tomar
ek sundar abhivykti ke sath....
to men aa jaaun......
is rachna ke liye aapko hardik badhyi....
unki pukar anytha nahi jati hai..
aap hi kya duniya bhi batati hai..
un-ne jab-2 pyar se manuhar ki,
har hal men bahar hi aa jati hai..
fir
ipvinder kaur - Nov 18
aap sab itna accha kaise likh lete hai, mai tu soch hi nahi paati...:(
→Ħ@r!§Ħ bĦ@┼┼←웃 - May 5बहुत खूब डा. साहब
ग़ज़ल मैं गेयता का पुट बखूबी हैं
बधाई
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