Monday, December 28, 2009


किसी के कोमल क़दमों की आहट है
शायद वो मेरे दिल से गुजर रही है
चाँद निकल आ तू अमावस की रात में
भीमेरे दिल की अप्सरा अब आसमा से उतर रही है
उसके मुस्कुराने से खिल उठे हैं फूल गुलशन
उसके गुनगुनाने से कायनात रक्स (नृत्य) कर रही है
वादा किया था उसने आज मेरे खवाबों में आने का
नींद से जाग वो अपने वादे से मुकर रही है
चांदनी रात में बैठा हु ताजमहल के सामने
जमना के पानी में तस्वीर तेरी उभर रही है
फूलों ख्याल रखना जरा उनके पाऊँ न छिल जांए
ऐ हवाओं थम जाओ उनकी जुल्फ बिखर है
चाँद सितारे फूल और कलियाँ सब आये हैं देखने
aaina बनी हैं मेरी आँखें वो सज संवर रही है
सुर्ख हो गया है हया से रंग चेहरे का होठ कपकपाते हैं
मेरे आगोश में "तोमर" वो और भी निखर रही है

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